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Flower Petal 7 May 2020



"कहते हैं बुद्ध को जब ज्ञान हुआ तो वह सात दिन चुप रह गए। चुप्पी इतनी मधुर थी। ऐसी रसपूर्ण थी, ऐसी रोआं-रोआं उसमें नहाया, सराबोर था, बोलने की इच्छा ही न जागी। बोलने का भाव ही पैदा न हुआ। कहते हैं, देवलोक थरथराने लगा। कहानी बड़ी मधुर है।

अगर कहीं देवलोक होगा तो जरूर थर-थराया होगा।कहते हैं ब्रह्मा स्वयं घबरा गए, क्योंकि कल्प बीत जाते हैं, हजारों-हजारों वर्ष बीतते हैं, तब कोई व्यक्ति बुद्धत्व को उपलब्ध होता है। ऐसे शिखर से अगर बुलावा न दे तो जो नीचे अंधेरी घाटियों में भटकते लोग हैं, उन्हें तो शिखर की खबर भी न मिलेगी। वे तो आंख उठाकर देख भी न सकेंगे; उनकी गरदनें तो बड़ी बोझिल हैं। वस्तुतः वे चलते नहीं, सरकते हैं, रेंगते हैं।

आवाज बुद्ध को देनी ही पड़ेगी। बुद्ध को राजी करना ही पड़ेगा। जो भी मौन का मालिक हो गया। उसे बोलने के लिए मजबूर करना ही पड़ेगा।

कहते हैं, ब्रह्मा सभी देवताओं के साथ बुद्ध के सामने मौजूद हुए। वे उसके चरणों में झुके। हमने देवत्व से भी ऊपर रखा है बुद्धत्व को। सारे संसार में ऐसा नहीं हुआ। हमने बुद्धत्व को देवत्व के ऊपर रखा है। कारण है देवता भी तरसते हैं बुद्ध होने को।

देवता सुखी होंगे, स्वर्ग में होंगे। अभी मुक्त नहीं हैं, अभी मोक्ष से बड़े दूर हैं। अभी उनकी लालसा समाप्त नहीं हुई है। अभी तृष्णा नहीं मिटी है। अभी प्यास नहीं बुझी है। उन्होंने और अच्छा संसार पा लिया है और सुंदर स्त्रियां पा ली हैं।
कहते हैं स्वर्ग में कंकड़-पत्थर नहीं है, हीरे जवाहरात हैं। कहते हैं स्वर्ग में जो पहाड़ हैं, वे शुद्ध स्फटिक माणिक के हैं। कहते हैं, स्वर्ग में जो फूल लगते हैं वे मुरझाते नहीं। परम सुख है।

लेकिन स्वर्ग से भी गिरना होता है। क्योंकि सुख से भी दुख में लौटना होता है। सुख और दुख एक ही सिक्के के पहलू हैं। कोई नरक में पड़ा है। कोई स्वर्ग में पड़ा है। जो नरक में पड़ा है वह नरक से बचना चाहता है। जो स्वर्ग में पड़ा है वह स्वर्ग से बचना चाहता है। दोनों चिंतातुर हैं। दोनों पीड़‍ित और परेशान हैं। जो स्वर्ग में पड़ा है, वह भी किसी लाभ के कारण वहां पहुंचा है। एक ने अपने लोभ के कारण पाप किया होगा। एक ने लोभ के कारण पुण्य किए हैं। लोभ में फर्क नहीं है।

बुद्धत्व के चरणों में ब्रह्मा झुके और कहा- आप बोलें! आप न बोलेंगे तो महा दुर्घटना हो जाएगी। और एक बार यह सिलसिला हो गया, तो आप परंपरा बिगाड़ देंगे। बुद्ध सदा बोलते रहे हैं। उन्हें बोलना ही चाहिए। जो न बोलने की क्षमता को पा गए हैं, उनके बोलने में कुछ अंधों को मिल सकता है, अंधेरे में भटकतों को मिल सकता है। आप चुप न हों, आप बोलें।

किसी तरह बमुश्किल राजी किया। कहानी का अर्थ इतना ही है कि जब तुम मौन हो जाते हो तो अस्तित्व भी प्रार्थना करते है कि बोलो, करुणा को जगाते हैं। उन्हें रास्ते का कोई भी पता नहीं। उन्हें मार्ग का कोई भी पता नहीं है। अंधेरे में टटोलते हैं। उन पर करुणा करो। पीछे लौटकर देखो।
साधारण आदमी वासना से बोलता है, बुद्ध पुरुष करुणा से बोलते हैं। साधारण आदमी इसलिए बोलता है कि बोलने से शायद कुछ मिल जाए, बुद्ध पुरुष इसलिए बोलते हैं कि शायद बोलने से कुछ बंट जाए। बुद्ध इसलिए बोलते हैं कि तुम भी साझीदार हो जाओ उनके परम अनुभव में। पर पहले शर्त पूरी करना पड़ती है। मौन हो जाने की, शून्य हो जाने की।

जब ध्यान खिलता है, जब ध्यान की वीणा पर संगीत उठता है, जब मौन मुखर होता है, तब शास्त्र निर्मित होते हैं, जिनको हमने शास्त्र कहा है, वह ऐसे लोगों की वाणी है, जो वाणी के पार चले गये थे। और जब भी कभी कोई वाणी के पार चला गया, उसकी वाणी शस्त्र हो जाती है। आप्त हो जाती है। उससे वेदों का पुनः जन्म होने लगता है।

पहले तो मौन को साधो, मौन में उतरो; फिर जल्दी ही वह घड़ी भी आएगी। वह मुकाम भी आएगा। जहां तुम्हारे शून्य से वाणी उठेगी। तब उसमें प्रामाणिकता होगी सत्य होगा। क्योंकि तब तुम दूसरे के भय के कारण न बोलोगे।

तुम दूसरों से कुछ मांगने के लिए न बोलोगे। तब तुम देने के लिए बोलते हो, भय कैसा। कोई ले तो ठीक, कोई न ले तो ठीक। ले-ले तो उसका सौभाग्य, न ले तो उसका दुर्भाग्य तुम्हारा क्या है? तुमने बांट दिया। जो तुमने पाया तुम बांटते गए। तुम पर यह लांछन न रहेगा कि तुम कृपण थे। जब पाया तो छिपाकर बैठ गए।" - ओशो



Daily quotes

Flower Petal 3 May 2020

कोरोना में बिहार के हालात बयां करती  एक कविता।



हाहाकार मचा है देखो, फिर डर गया जवान,
फिर समेट कर बोरा-बिस्तर वापस चला जवान,
वापस  चला जवान,  अभी  भी  है परेशानी
लेकर  जाने  वाले   करते   खींचा-तानी

विपदा में भी लुट मची है, नियम  ऐसा
रेलमंत्री  मांग  रहा  ढोने  का  पैसा,
पैसा का है खेल, अभी भी आना-जाना?
पी०एम० जी क्यों बांट रहे घर-घर में दाना?

दाना भी  बन  बवंडर,  क्या  बतलावें
हर  बोरी  पर लूट  मची है, किसे सुनाएं
दाना पर भी  घुसखोरों  ने घात लगाया।
व्यर्थ हुआ हर प्रण, जो भारत मां ने खाया।

लाकडाउन में बना, यहां का नियम ऐसा।
पुलिस मांगती, बाॅर्डर पार करा कर पैसा।
हर दुकान वाले को चाहिए अधिक मुनाफा
हर कोई मांगे भीख माथ पर बांधे साफा।*

कहे कवि यह बात, बचा अब कोई न चारा।
सोचों  किससे  जूझ रहा  है देश  हमारा।
सब अपनी जेबें  भरने को दौड़  रहे हैं।
भोली जनता को सब यहां भमोड़ रहें हैं।*

:-हरि ओम शर्मा
लेखक, कवि, शिक्षक
(बिहार राज्य के मूल निवासी)


कविता में दो देशी शब्द प्रयोग हुए हैं । 
१. साफा =पगड़ी
२. भमोड़= नोच

Flower Petal 1 May 2020

*कोरोना काल की एक कविता*

कोई चाबी का छल्ला,
किसी कोने का बल्ला,
किसी के घर की खुरपी,
किसी दर्जी की कुरती,
कोई टुटा खिलौना,
कोई सुना बिछौना,
बहुत दिन से, युं ही
सुना पड़ा है।

सभी कष्टों से अपने,
दुर जाना चाहते हैं।
समस्या एक है,
सब पार पाना चाहते हैं।

मगर संशय यही है,कि
किसी को धन नहीं है,
किसी को मन नहीं है।

- हरि ओम शर्मा


Daily quotes

Flower Petal 29-04-2020

"हमारा मन जितना साफ होगा,हमारा लक्ष्य उतना ही स्पष्ट होगा। कई बार विचारों के उधेड़बुन में हम इतने खो जाते हैं कि वर्तमान से खो जाते हैं। इसलिए कम सोचिए, काम का सोचिए।"
-हरि ओम शर्मा
साभार- (Facebook profile)


Daily quotes

Flower Petal 28 April 2020

होते होते हो जाता है।

आशा के दीपक जलते हैं।
हम उम्मीदों में पलते हैं।
आशाएं धरी रह जाती है।
कुछ और घटित हो जाता है।

होते होते हो जाता है।

हम निश्चित सपने बुनते हैं।
हम रहबर अपने चुनते हैं।
चुनें हुए सब रह जाते हैं।
अन्य ही कोई आ जाता है।

होते होते हो जाता है।
                 ‌आगे जारी......

Sometimes I feel that even I am unable to understand what I wanted to say..
But,still inside me there is someone who understands it better than it should be understood..
I dream, I desire,
 I work because
He inspire...

-हरि ओम शर्मा
साभार :- Facebook profile

Flower Petal 27april 2020

कालनेमी का जानिए, इतना ही था काम।
भीतर रावण पल रहा, मुंह पर थे श्री राम। 
                             

ये युग कालनेमियों का युग है। बड़ा अद्भुत जीव था कालनेमी। हनुमानजी जैसे परम बुद्धिमान व्यक्ति को भी छल से भ्रमित कर चुका था। वो तो उनका सौभाग्य था कि सही समय पर दैवी संयोग से उन्हें उचित मार्गदर्शन मिला और रामकाज सफल हो सका। 
ऐसे गुरुओं का सिलसिला बदस्तूर जारी है। अब आगे क्या होगा, राम ही जाने।
राम भजिए पर सतर्क रहिए। भक्ति में सतर्कता बहुत जरूरी है। सावधानी हटी, दुर्घटना घटी।
:-हरि ओम शर्मा 

Daily message

इस समय का सबसे आसान कार्य है गाली देना और इसे आप बेख़ौफ़ कर सकते हैं।  आप ऊंचे से ऊंचे व्यक्ति को भी अपनी सुविधा अनुसार नीचे खींच सकते हैं। उनपर अपनी मनपसंद गाली चस्पा सकते हैं। जितनी बार चाहें उतनी बार चस्पा सकते हैं। 
आप अकेले नहीं हैं। आप एक निकालिए। आपके साथी के पास सदी के सबसे बड़ी शक्तिशाली यंत्र है जो आपके एक को अनेक बना सकता है। आपकी शक्ति बढ़ा सकती है।
एक सबसे सकारात्मक बात जो आपके पक्ष में है वह ये कि आप को अपनी गाली की जिम्मेवारी लेने की कोई आवश्यकता नहीं है। आप चाहें तो उसे आगंतुक अथवा स्वयंभू आदि विशेषणों से भी सत्कार सकते हैं। 
आप अर्थ अनर्थ की चिंता न करें। अपनी रचनात्मकता पर ध्यान दें। हारने का तो सवाल ही नहीं है। आप किसी भी संरचना की गाली दे सकते हैं। समाज को सब स्वीकार्य है। आप हिन्दू हैं तो मुसलमान को दे दिजिए, मुसलमान है तो हिन्दू को दे दिजिए। ऊंची जाति के हैं तो नीची जाति को दे दिजिए, नीची है तो ऊंची को दे दिजिए। पुरूष है तो महिला को दे दिजिए, महिला हैं तो पुरुष को दे दिजिए। कांग्रेस है तो बीजेपी को दे दिजिए, बीजेपी है तो कांग्रेस को दे दिजिए। आप अपने विचार स्वतंत्र होकर रखे, आपको कोई नहीं रोकेगा। आप बस सीढ़ी चढ़ने की तैयारी करें। ऊंची से ऊंची गाली दे।आप हमारे भविष्य की भाषा है और भविष्य इसी भाषा की मांग कर रहा है। मैं-आप सभी इसकी मिठास का आनंद लेने को लालायित हैं। 
तो चलिए 'भद्रम् कर्णेभि श्रृनुयाम् ' का लालित्य बढावें।
एक नये विचारधारा को दृढ करें-#गालीगलौजवाद।

नोट:-  यह पुरा आलेख एक व्यंग्य मात्र है। मुझे आपकी जिस भावना को छुना था, मैं छु चुका हूं।आप मेरी बात से सहमत हों, न हो। आप स्वतंत्र है।