"Powerful Yuva" हरि ओम शर्मा के द्वारा संचालित एक सामुहिक मंच है। जिसमें 'समाज की प्रगति' और 'युवाओं के उत्थान' पर विशेष बल देते हुए लेख, कविता, विचार, आलोचना आदि प्रकाशित किये जाते हैं। आप Facebook और Youtube पर भी 'PowerfulYuva' से जुड़ सकते हैं।
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काव्य मंजूषा ६
हे देव! दिवस ऐसा भी हो।
हर स्वर में एकल राग उठे,
हर हवन कुंड से आग उठे,
सोया हर चेतन जाग उठे,
हर उर से जड़ता भाग उठे।
हे देव! दिवस ऐसा भी हो।
गागर से अमृत छलक उठे,
हर रोम-रोम फिर पुलक उठे,
चिंगारी हर दिल सुलग उठे,
सोयी ऊर्जाएं से धधक उठे।
हे देव! दिवस अब ऐसा हो।
किसी ओर से युं तुफान आए,
आलसी तनों में प्राण आए,
हर नर में स्वाभिमान आए,
ऊंचा जन-मन-गण गान आए।
हे देव! दिवस ऐसा ही हो।
भारत माता सम्मान पाए,
ऐसा हम किर्तिमान लाएं,
हम फिर खोई पहचान पाए,
जन-जन जिससे कल्याण पाए।
हे देव! दिवस अब ऐसा दो।
-हरि ओम शर्मा
काव्य मंजूषा ४
इक मोर्चा घर पर है बैठा,
और इक मोर्चा सड़कों पर..
इक बैठा है बड़े चैन से,
इक उबल रहा है सड़कों पर...
इक का दम घुटता है घर में,
इक घर जाने को सड़कों पर..
इक को जान नहीं है प्यारी,
इक जान बचाता सड़कों पर...
इक का तकिया पड़ा सेज पर,
इक का तकिया सड़कों पर...
इक की थाली में है रोटी,
इक की रोटी सड़कों पर..
क्या हालत हो गई देश की,
आग लगी है सड़कों पर..
- हरि ओम शर्मा
सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया...
हर हर महादेव 🙏🙏
काव्य मंजूषा 2
विधाता ने मेरे, है क्या मन में बोया..
न जाने कहां पर, हूं आकर मैं खोया..
न संगी, न साथी, न बंधु, न मितवा..
न अपना-पराया, न शत्रु न हितवा..
न जाने कहां फंस गया हूं मैं आकर ।
हूं बैठा किनारे, मैं नैय्या डुबाकर ।
बस इक आस है,कोई मुझको पुकारे।
लिए अपनी गोदी में, मुझको दुलारे।
सुनो मां!
कहां हो? तुम आ जाओगी न?
पुनः मेरे मस्तक को सहलाओगी न?
कहो और कितने दिवस युं गुजारूं?
कहो कैसे स्वर में मैं तुमको पुकारूं?
क्षमा दो दया दो मुझे अब बचा लो..
शरण में हूं आया गले से लगा लो..
- हरि ओम शर्मा
हर हर महादेव
काव्य मंजूषा 1
रावण मरा नहीं, रावन नहीं मरता,
वह अजर है और अमर भी।
आप हर साल उसके मरने की खुशी मनाते हो,
पर भूल जाते हो
कि अगले साल फिर आएगा।
वह हर साल आकर
ऋषियों का खून खिंचेगा,
देवताओं को तंग करेगा,
चहुंओर शांति भंग करेगा,
सीताओं को हरेगा
रामों को चुनौती देगा,
हर वर्ष,
उसका वंश खत्म होगा,
हर वर्ष,
उसका वंश पुनः जन्मेगा,
रावण ही नहीं ये सब भी,
अजर है और अमर भी,
ये नहीं मरते, ये नहीं मरेंगे,
आप हर साल इनके,
मरने की खुशी मनाते रहो,
ये नहीं मरें है, ये आपको मिलेंगे,
आपके गांव-समाज के बीच
चलते-फिरते, हंसते-खेलते,
आप ही की तरह,
आप पहचान नहीं पाओगे,
पर ये खुद को पहचानते हैं,
इन्हें अपना अस्तित्व बनाए रखना है,
और
इसीलिए खुद को छीपाए रखना है,
ये मयावी है और चतुर भी,
ये प्राय: स्वेत वस्त्र धारण करते हैं,
हितोपदेश की बातें बोलते हैं,
लोककल्याण के नारे लगाते हैं,
पर ये है रावण ही,
विनाश तक न तो इनका दंभ कमेगा,
न ही ये अहंकार की भाषा छोरेंगे,
आप इन्हें नहीं मार सकते,
क्योंकि
यह अजर है और अमर भी
आप ही तो हर वर्ष इसे
मरकर जिंदा होने का वरदान देते हैं,
आपकी बुराई में निष्ठा ही इसका बल है
आपकी सत्यनिष्ठा के बिना यह अड़ींग है, निश्चल है।
- हरि ओम शर्मा
(बैठ कर लिखा गया ख्यालों का एक पूलिंदा)
हर हर महादेव
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