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मन मेरे,विचलित मत होना!


मन मेरे, विचलित मत होना।

बाधाओं का आना-जाना,
लगा रहेगा
संगी-साथी खोना-पाना,
लगा रहेगा
ना आए तो रोना मत
आ जाए तो पुलकित मत होना
मन मेरे, विचलित मत होना।


निशा-दिवस का खेल सदा ही
लगा रहेगा
काम और विश्राम सदा ही
लगा रहेगा
नहीं मिले तो रोना मत
मिल जाए तो पुलकित मत होना
मन मेरे, विचलित मत होना।


माया भ्रम के सारे बंधन
तोड़ दे प्यारे।
कर्म किए जा, फल की चिंता
छोड़ दें प्यारे।
नहीं मिले तो रोना मत
मिल जाए तो पुलकित मत होना
मन मेरे, विचलित मत होना।

~हरि ओम शर्मा

शुरुआत करो



आशाओं के दीप जला लो

फिर फैला दो आज उजाला

बेमन से जीवन में भर लो

तुम फिर से नवरस का प्याला

फिर से महका दो बगिया को

डाल-डाल पर पुष्प सजाकर

हर घर को रौशन कर दो तुम

द्वार-द्वार आंगन में जाकर

जीवन करवट रोज बदलती

सुख-दुख आते-जाते हैं

रोज चुनौती नई-नई दे

नई सिख सिखलाते है

जो सुख-दुख में नहीं बदलता

निश्चल अड़ींग सदा रहता है

उदय अस्त में एक सा रहता

जग का तिमिर वही हरता है।


हरि ओम शर्मा